गायत्री गीता (गायत्री महाविज्ञान भाग-२) के अनुसार गायत्री मन्त्र के नौ शब्दों में सन्निहित सूत्र इस प्रकार है-
१. तत्- यह परमात्मा के उस जीवन्त अनुशासन का प्रतीक है, जन्म और मृत्यु जिसके ताने-बाने हैं । इसे आस्तिकता-ईश्वर निष्ठा के सहारे जाना जाता है । उपासना इसका आधार है ।
२. सविर्तु- सविता, शक्ति उत्पादक केन्द्र है । साधक में शक्ति विकास का क्रम चलना चाहिए । यह जीवन साधना से साध्य है ।
३. वरेण्यं- श्रेष्ठता का वरण, आदशर्-निष्ठा, सत्य, न्याय, ईमानदारी के रूप में यह भाव फलित होता है ।
४. भर्गो- विकारनाशक तेज है, जो मन्यु साहस के रूप में उभरता और निर्मलता, निर्भयता के रूप में फलित होता है ।
५. देवस्य- दिव्यतावर्द्धक है । सन्तोष, शान्ति, निस्पृहता, संवेदना, करुणा आदि के रूप में प्रकट होता है ।
६. धीमहि- सद्गुण धारण का गुण, जो पात्रता विकास और समृद्धिरूप में फलित होता है ।
७. धियो- दिव्य मेधा, विवेक का प्रतीक शब्द है, समझदारी, विचारशीलता, निर्णायक क्षमता आदि का संवर्द्धक है ।
८. यो नः- दिव्य अनुदानों के सुनियोजन, संयम का प्रतीक है । धैर्य, ब्रह्मचर्यादि का उन्नायक है ।
९. प्रचोदयात्- दिव्य प्रेरणा, आत्मीयताजन्य सेवा साधना, सत्कर्त्तव्य निष्ठा का विकासक है ।
यज्ञोपवीत के धागों में नीति का सम्पूर्ण सार सन्निहित कर दिया गया है । जैसे कागज का स्याही के सहारे किसी नगण्य से पत्र या तुच्छ सी लगने वाली पुस्तक में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ज्ञान-विज्ञान भर दिया जाता है, उसी प्रकार सूत्र के इन नौ धागों में जीवन-विकास का सारा मार्गदर्शन समाविष्ट कर दिया गया है । इन धागों को कन्धे पर, कलेजे पर, हृदय पर, पीठ पर प्रतिष्ठित करने का प्रयोजन यह है कि सन्निहित शिक्षा का यज्ञोपवीत के धागे स्मरण कराते रहें, ताकि उन्हें जीवन व्यवहार में उतारा जा सके । यज्ञोपवीत को माँ गायत्री और यज्ञ पिता की संयुक्त प्रतिमा मानते हैं ।
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